फिल्म ‘जनहित में जारी’ में एक ऐसे विषय को कॉमेडी के रूप में पेश किया गया है जिसके बारे में आज भी हमारे समाज में बात करने से लोग कतराते हैं।

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फिल्म एक छोटे शहर की कहानी है जहां कंडोम खरीदना और बेचना एक अपराध जैसा होता है। कंडोम बेचने वाली लड़की के बारे में जब उसके परिवार को पता चलता है

तो फिल्म की कहानी थोड़ा गंभीर होती है। यह फिल्म के इंटरवल के बाद होता है। फिल्म का पहला हिस्सा देखते हुए आप कई बार हंस-हंसकर लोट-पोट हो जाते हैं।

इसका श्रेय फिल्म के लेखक राज शांडिल्य (ड्रीम गर्ल के निर्देशक) और जय बसंतु सिंह के निर्देशन को जाता है।

राज शांडिल्य अपने लेखन से हंसाने में कामयाब रहे हैं। उन्होंने हर सीन को आसान तरीके से दिखाया है। छोटे शहर के जोक्स और बुंदेलखंडी टोन नजर आता है।

जब बिजली चली जाती है तो कोई चिल्लाता है, ‘ट्रांसफार्मर फुक्क गयो’ जो कि कस्बों और गांव में सुनाई पड़ता है। इस तरह की छोटी-छोटी चीजें  फिल्म को जमीनी रूप से प्रामाणिक बनाती हैं।

फिल्म में जमीनी स्तर का हास्य चलता है। इसी बची गर्भपात से मरने वालीं लड़कियों का जिक्र होता है। फिल्म में महिला स्वास्थ्य के आंकड़े और घरों में होने वाले झगड़ों को भी बारीकी से फिल्म में रखा गया है।