500+ Short Stories in Hindi with Moral for Kids

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इंसान की कीमत | Short Hindi Story with Moral

एकबार एक टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे। बच्चों को कुछ नया सिखाने के लिए टीचर ने जेब से 100 रुपये का एक नोट निकाला। अब बच्चों की तरफ वह नोट दिखाकर कहा – क्या आप लोग बता सकते हैं कि यह कितने रुपये का नोट है ?

सभी बच्चों ने कहा – “100 रुपये का”

टीचर – इस नोट को कौन कौन लेना चाहेगा ? सभी बच्चों ने हाथ खड़ा कर दिया।

अब उस टीचर ने उस नोट को मुट्ठी में बंद करके बुरी तरह मसला जिससे वह नोट बुरी तरह कुचल सा गया। अब टीचर ने फिर से बच्चों को नोट दिखाकर कहा कि अब यह नोट कुचल सा गया है अब इसे कौन लेना चाहेगा ?

सभी बच्चों ने फिर हाथ उठा दिया।
अब उस टीचर ने उस नोट को जमीन पर फेंका और अपने जूते से बुरी तरह कुचला। फिर टीचर ने नोट उठाकर फिर से बच्चों को दिखाया और पूछा कि अब इसे कौन लेना चाहेगा ?

सभी बच्चों ने फिर से हाथ उठा दिया।
अब टीचर ने कहा कि बच्चों आज मैंने तुमको एक बहुत बड़ा पढ़ाया है। ये 100 रुपये का नोट था, जब मैंने इसे हाथ से कुचला तो ये नोट कुचल गया लेकिन इसकी कीमत 100 रुपये ही रही, इसके बाद जब मैंने इसे जूते से मसला तो ये नोट गन्दा हो गया लेकिन फिर भी इसकी कीमत 100 रुपये ही रही।

ठीक वैसे ही इंसान की जो कीमत है और इंसान की जो काबिलियत है वो हमेशा वही रहती है। आपके ऊपर चाहे कितनी भी मुश्किलें आ जाएँ, चाहें जितनी मुसीबतों की धूल आपके ऊपर गिरे लेकिन आपको अपनी कीमत नहीं गंवानी है। आप कल भी बेहतर थे और आज भी बेहतर हैं।

सबसे बड़ा खजाना | Short Hindi Story with Moral

एक लोहार था। उसने एक बढ़ई के लिए हथोडा बनाया। हथोडा बहुत ही सुन्दर और मजबूत बना था।हथोड़े की सुन्दरता और मजबूती देख बढ़ई ने सोचा क्यों न लोहार से एक हथोडा और बनवा लूँ।

बढ़ई लोहार के पास गया और बोला, “तुम मेरे लिए एक हथोडा और बना दो लेकिन इस बार जो हथोडा बनाना वह पहले वाले हथोड़े से भी ज्यादा सुन्दर होना चाहिए और इसके लिए में तुम्हें मुह माँगा इनाम दूंगा।

लोहार नें बढ़ई की बात सुनी और विनम्रता पूर्वक कहा, “नहीं यह तो नहीं हो पाएगा”

बढ़ई, लोहार की बात सोनकर आश्चर्यचकित हुआ औ बोला, “आखिर क्यों ? तुम्हें तो तुम्हारा मुह माँगा इनाम मिलेगा| फिर तुम इसके लिए मना क्यों कर रहे हो।

लोहार नें कहा, “दाम की बात नहीं है में जब भी कोई चीज बनता हूँ पूरी योग्यता और लगन के साथ बनता हूँ। आपके लिए हथोडा बनाने के लिए मेने पूरी लगन और महनत से काम किया है। अब आप ही बताइए में इस से आचा और सुन्दर हथोडा कैसे बना सकता हूँ।

अगर में आपकी बात मन लेता हूँ और कहता हूँ की हाँ में यह कम कर सकता हूँ तो इसका मतलब यह होगा की पहले वाले हथोड़े को बनाने में मैंने कोई कसार बाकि रख दी थी इसलिए इस हथोड़े को में और भी ज्यादा सुन्दर बना सकता हूँ लेकिन यह तो सत्य नहीं है| मेने आपके लिए पहले ही पूरी ईमानदारी और लगन के साथ हथोड़े का निर्माण किया है।

इसलिए कहने का तात्पर्य यह है की किसी के लिए भी कोई भी कार्य करो तो उसे पुरे तन-मन से, महनत से करो। उसे अच्छे से अच्छा बनाने में कोई भी कसार बाकि मत छोड़ो।

दो बच्चें की कहानी | Short Hindi Story with Moral

यह कहानी है दो बच्चों की जो एक गाँव में रहते थे। बड़ा बच्चा 10 साल का था और छोटा 7 साल का। दोनों हमेशा एक दुसरे के साथ रहते, एक दुसरे के साथ खेलते और एक दुसरे के साथ ही घूमते। एक दिन दोनों खेलते-खेलते गाँव से थोड़ा दूर निकल आए।अचानक खेलते-खेलते 10 साल के बच्चे का पैर फिसल गया और वह कुए में गिर गया और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा। अपने दोस्त की आवाज़ सुनकर जब छोटे बच्चे को इस बात का पता चला तो वह बहुत घबराया। उसने अपने आस-पास देखा और मदद के लिए चिल्लाया। लेकिन वहां आसपास कोई नहीं था जो उसकी मदद कर सकता था।

अचानक उसकी नज़र पास ही पड़ी एक बाल्टी पर पड़ी, जिस पर एक रस्सी बंधी थी। उसने बिना कुछ सोचे वह रस्सी कुए में फेकी और अपने दोस्त को उस रस्सी को पकड़ने को बोला। अगले ही पल वह 7 साल का बच्चा उस 10 साल के बच्चे को पागलों की तरह कुए से बाहर निकालने के लिए खिंच रहा था| उस छोटे से बच्चे ने अपने दोस्त को कुए से बहार निकालने के लिए अपनी पूरी जान लगा दी। आखिरकार वह बच्चा अपने दोस्त को बचाने में कामियाब हुआ और उसने अपने दोस्त को कुए से बाहर निकाल लिया।

लेकिन उन्हें असली डर तो इस बात का था की जब वो गाँव जाएँगे तो उन्हें बहुत मार पड़ने वाली है। खैर, दोनों डरते-डरते गाँव पहुंचे और उन्होंने गाँव वालों को खेलते-खेलते कुए में गिरने और रस्सी के सहारे छोटे बच्चे द्वारा बड़े बच्चे को बाहर निकालने वाली पूरी बात बता दी। लेकिन गाँव वालों ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया और हसने लगे कि आखिर एक 7 साल का बच्चा एक 10 साल के बच्चे को रस्सी के सहारे कुए से बहार कैसे निकाल सकता है।

लेकिन वहां मौजूद एक बुजुर्ग ने उन बच्चों की बातों का भरोसा कर लिया। उन्हें सब “करीम चाचा” कहते थे। करीम चाचा गाँव के सबसे समझदार बुजुर्गों में से एक थे। गाँव वालों को जब करीम चाचा के बच्चों की बात पर विश्वास करने की बात पता चली तो सब इक्कठे होकर करीम चाचा के पास पहुंचे और बोले “चाचा! हमें तो बच्चों की बात पर यकीन नहीं हो रहा है, आप ही बता दो की ऐसा कैसे हो सकता है। गाँव वालों की बात सुनकर करीम चाचा बोले, “बच्चे बता तो रहें हैं उन्होंने यह कैसे किया। बच्चे ने कुए में रस्सी फेंकी और दुसरे बच्चे को ऊपर खीच लिया।

गाँव वालों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। कुछ देर बाद करीम चाचा मुस्कुराए और बोले, “सवाल ये नहीं है की बच्चे ने यह कैसे किया, सवाल यह है की वह यह कैसे कर पाया।और इसका सिर्फ एक ज़वाब है की जिस वक़्त वह बच्चा यह कर रहा था उस वक़्त उसको वहां यह बताने वाला कोई नहीं था की तू यह नहीं कर सकता।यहाँ तक की वह बच्चा खुद भी नहीं।

तैमुर और चींटी | Short Hindi Story with Moral

तैमुर के दुश्मनों ने तैमुर का पिचा किया तो वह घने जंगलों में भाग गया और पहाड़ों में एक खंडहर में शरण ले ली। थकावट के कारण वह वहीँ लेट गया।

तभी लेते लेते उसकी नज़र एक चींटी पर पड़ी। वह देखता है की एक चींटी एक चावल का दाना मुह में दबाकर दिवार पर चढ़ रही है, फिर वह दाना निचे गिर जाता है।

अगली बार चींटी फिर उस दानें को लेकर दिवार पर चढ़ती है और इस बार वह खुद निचे गिर जाती है। ऐसा कई बार होता है कभी वह चावल का दाना निचे गिर जाता है और कभी वह चींटी।

तैमुर लेटा-लेटा उस चींटी के प्रयासों को गिनता रहता है। वह चींटी 16 बार चावल के दानें को ले जाने में असफल होती है लेकिन 17 वि बार वह उस दानों को ले जाने में सफल हो जाती है।

तभी तैमुर को झटका लग और वह फिर से अपने दुश्मनों से लड़ने के लिए युद्ध क्षेत्र में आ गया। वह लगातार अपने दुश्मनों से लड़ता रहा और एक दिन सफ़र हो गया।

इसलीये दोस्तों, असफलता से हमें घबराना नहीं चाहिए वरन असफलता से सिख लेकर हमें आगे बढ़ना चाहिए। इसी लिए कहा गया है गिरो, उठा और आगे बढ़ो।

झूंठ फरेब का महल | Short Hindi Story with Moral

बहुत प्रभावित था। उसने कारीगर को दरबार में बुलाया और कहा, “तुम हमारे लिए राज्य का सबसे सुदर महल बनाओ। हमारे पास धन को कोई कमी नहीं है तुम जितना धन मांगोगे उतना तुम्हे मिलेगा।

कारीगर कुशल तो था लेकिन उसे अपनी कला का घमंड आ चूका था। सब जगह से अपने काम की तारीफ सुनकर अब उसके मन में कामचोरी और आलस्य की प्रवति आ चुकी थी।

खैर, कारीगर महाराज की आज्ञा पा कर अपने काम में जुट गया। लेकिन थोड़े ही दिन बाद उसके मन में विचार उठा की क्यों न रद्दी, घटिया किस्म का माल लगाकर क्जल्दी से जल्दी महल का क्काम समाप्त कर के मोटा मुनाफा कमा लिया जाए। और उसने यही किया।

कारीगर ने घटिया किस्म का माल लगाकर महल की भुरभुरी दीवारें कड़ी कर दी।कारीगर ने बाहर से महल को सुन्दर साज सज्जा से चमका दिया लेकिन अन्दर से महल में क्जच्चा माल लगा था। थोड़े ही दिन में आकर्षक सुन्दरता वाला, सोने सी चमक-दमक वाला सुन्दर सा महल तैयार हो गया।

महल खड़ा करने के बाद अक्रिगर राजा की सेवा में पहुंचा और राजा को महल के बन्नने की सुचना दी। राजा अगले ही दिन महल का निरिक्षण करने के लिए पहुंचे। महल को देख राजा बहुत ही प्रभावित हुए।महल बहुत ही आकर्षक और सुन्दर लग रहा था।

राजा ने कारीगर की बहुत प्रशंशा की और कहा, “में तुम्हारी कुशलता से बहुत प्रभावित हूँ। इतने सुन्दर महल निर्माण के लिए तुम्हे जो भी इनाम दिया जाए वो कम है। में सोच रहा हूँ इस अद्भुत कार्य के लिए तुम्हें क्या इनाम दिया जाए। फिर थोडा सोच विचार कर महाराज मुस्कुराए और बोले, “लो तुम्हें यही यही महल पुरूस्कार में देता हूँ।”

महाराज की बात सुनकर कारीगर हतप्रभ रह गया। उसे क्या मालूम था की जिस महल को वह घटिया माल से बना रहा है वही महल एक दिन उसे इनाम में मिल जाएगा।

राजा महल का निरिक्षण कर और महल को कारीगर को इनाम में दे ककर चले गए। कारीगर अपने किए पर मुह छिपा कर रोने लगा।

इनाम के लालच में कारीगर का बनाया गया खोखला महल उसी के हत्थे चढ़ गया।

हाथी और रस्सी | Short Hindi Story with Moral

एक व्यक्ति रास्ते से गुजर रहा था कि तभी उसने देखा कि एक हाथी एक छोटे से लकड़ी के खूंटे से बंधा खड़ा था।व्यक्ति को देखकर बड़ी हैरानी हुई कि इतना विशाल हाथी एक पतली रस्सी के सहारे उस लकड़ी के खूंटे से बंधा हुआ है।

ये देखकर व्यक्ति को आश्चर्य भी हुआ और हंसी भी आयी। उस व्यक्ति ने हाथी के मालिक से कहा – अरे ये हाथी तो इतना विशाल है फिर इस पतली सी रस्सी और खूंटे से क्यों बंधा है ? ये चाहे तो एक झटके में इस रस्सी को तोड़ सकता है लेकिन ये फिर भी क्यों बंधा है ?

हाथी के मालिक ने व्यक्ति से कहा कि श्रीमान जब यह हाथी छोटा था मैंने उसी समय इसे रस्सी से बांधा था। उस समय इसने खूंटा उखाड़ने और रस्सी तोड़ने की पूरी कोशिश की लेकिन यह छोटा था इसलिए नाकाम रहा। इसने हजारों कोशिश कीं लेकिन जब इससे यह रस्सी नहीं टूटी तो हाथी को यह विश्वास हो गया कि यह रस्सी बहुत मजबूत है और यह उसे कभी नहीं तोड़ पायेगा इस तरह हाथी ने रस्सी तोड़ने की कोशिश ही खत्म कर दी।

आज यह हाथी इतना विशाल हो चुका है लेकिन इसके मन में आज भी यही विश्वास बना हुआ है कि यह रस्सी को नहीं तोड़ पायेगा इसलिए यह इसे तोड़ने की कभी कोशिश ही नहीं करता। इसलिए इतना विशाल होकर भी यह हाथी एक पतली सी रस्सी से बंधा है।

दोस्तों उस हाथी की तरह ही हम इंसानों में भी कई ऐसे विश्वास बन जाते हैं जिनसे हम कभी पार नहीं पा पाते। एकबार असफल होने के बाद हम ये मान लेते हैं कि अब हम सफल नहीं हो सकते और फिर हम कभी आगे बढ़ने की कोशिश ही नहीं करते और झूठे विश्वासों में बंधकर हाथी जैसी जिंदगी गुजार देते हैं।

हर अच्छे काम में सहायता | Short Hindi Story with Moral

रावन द्वारा सीता हरण के बाद भगवन राम रवां से युद्ध करने के लिए और लंका तक पहुचने के लिए सागर पर पुल बंधवा रहे थे। भालू, बन्दर बड़े बड़े पत्थर उठा कर समुद्र में डाल रहे थे।

तभी भगवान् राम की दृष्ठि एक गिलहरी पर पड़ी। गिलहरी बालू में लोटती जिससे उसके शारीर पर बालू के कुछ कण चिपक जाते थे। फिर वह उन चिपके हुए कानों को पुल पर जमें हुए पत्थरों पर गिरा देती थी।

यह देखकर भगवान् राम आश्चर्यचकित हुए और बड़े प्यार से गिलहरी के पास जाकर उसे हाथ में उठाया और उससे पूछा,“यह तुम क्या कर रही हो”

प्रभु राम का स्नेह पाकर गिलहरी बोली, “इस पुनीत कार्य में बन्दर-भालू तो बड़े-बड़े पत्थर उठा कर पुल का निर्माण कर रहें हैं। में छोटी सी गिलहरी भला इतने बड़े पत्थर कैसे उठा सकती हूँ इसलिए बालू के छोटे-छोटे कण उठा कर इस कार्य में अपना योगदान दे रही हूँ।

आप एक आचे कम के लिए निकले है और अच्छे कार्य में तो सहयोग करना ही चाहिए।

गिलहरी की बात सुनकर भगवान् राम बहुत प्रसन्न हुए। कहा जाता है की गिलहरी के कार्य से प्रसन्न होकर भगवान् राम ने स्नेहता से उसके शारीर पर अपना हाथ फेरा था और आज भी गिलहरी के शरीर पर जो धारियां दिखाई देती है वह भगवान् राम की उँगलियों के निशान ही है।इसलिए हमें यह कभी नहीं सोचना चाहिए की हमारा योगदान कितना बड़ा है। किसी भी अच्छे कायर के लिए जितना और जैसा भी हम कर सकते हैं वह हमें अवश्य करना चाहिए।

लगन का फल | Short Hindi Story with Moral

उस बालक का मन विद्यालय में नहीं लगता था। विद्यालय में वह और छात्रों के द्वारा मंदबुद्धि कहलाता था। कक्षा में भी वह बालक सबसे पीछे रहता था , उसके अध्यापक भी उससे नाराज़ रहते थे। क्योकि उसकी बुद्धि का स्तर औसत से भी नीचे था। कक्षा में भी उसका प्रदर्शन हमेशा निराशाजनक ही होता था। अपने दोस्तों एवं सहपाठियो के बीच वह उपहास का विषय था। विद्यालय में वह जब की प्रवेश करता उस बालक पर चारों ओर से व्यंग और बाणो की बौछार सी होने लगती। इन सब बातों से परेशान हो कर , तंग आकर विद्यालय जाना ही छोड़ दिया।

एक दिन वह बालक मार्ग पर यूँ ही चलता हुआ जा रहा था। चलते हुए उसे ज़ोरो की प्यास लगी, वह इधर – उधर अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी तलाशने लगा। अंत में उसे एक कुआँ दिखाई दिया , वे वहाँ गया और अपनी प्यास बुझाई। वह चलता – चलता काफी थक गया था , इसीलिए पानी पीने के बाद वही बैठ गया , तभी उसकी नज़र पत्थर पर पड़े , उस निशान पर गयी. जिस पर बार – बार कुँए से पानी खींचने के कारण रस्सी के निशान पड़ गए थे। वह मन ही मन सोचने लगा की जब बार – बार कुँए से पानी खींचने से पत्थर पर निशान पड़ सकते है तो निरंतर अभ्यास से मुझे भी विद्या आ सकती सकती है।

उसने अपने इस विचार को गांठ बांध लिया और पुनः विद्यालय जाना शुरू कर दिया। उसकी लगन देख कर अध्यापको ने भी उसका भरपूर सहयोग किया। उसने मन लगा कर कठिन परिश्रम किया। कुछ सालो बाद यही बालक महान विद्वान वरदराज के रूप में विख्यात हुए , जिन्होंने संस्कृत में मुग्धबोध और लघुसिद्धांत कौमुदी जैसे ग्रंथो की रचना की।

इस कहानी का अर्थ – अगर धैर्य , लगन और परिश्रम से कार्य किया जाये तो उन पर विजय प्राप्त कर अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है। सामान्यता यह होता है की लोग बड़ी उत्सुकता से काम तो शुरू कर देते है परन्तु धैर्य खो देते है। लेकिन जो लोग लगन से काम करते रहते है। उन्हें सफलता अवश्य मिलती है।

निव का पत्थर | Short Hindi Story with Moral

लाल बहादुर श्रास्त्री बड़े ही हसमुख स्वाभाव के थे। लोग प्रायः ही उनसे उनके हसमुख स्वाभाव और निःस्वार्थ सेवा भावना के लिए प्रभावित हो जाया करते थे।

एक बार लाल बहादुर श्रास्त्री को लोक सेवा मंडल का सदस्य बनाया गया। लेकिन लाल बहादुर श्रास्त्री बहुत संकोची थे वे कभी नहीं चाहते थे की उनका नाम अखबारों में छपे और लोग उनकी प्रशंशा और स्वागात करे। एक बार शास्त्री जी के मित्र नें उनसे पूछा, “शास्त्री जी! आप अख़बारों में नाम छपवाने में इतना परहेज़ क्यों करते हैं।

शास्त्री जी मुस्कुराए और बोले, “लाला लाजपत राए जी ने मुझे लोक सेवा मंडल के कार्यभार को सोंपते हुए कहा था की, लाल बहादुर ताजमहल में दो तरह के पत्थर लगे हैं। एक बढ़िया संगमरमर के पत्थर हैं, जिन्हें दुनियां देखती है और प्रशंशा करती है।

और दुसरे ताजमहल की नीव में लगे हैं जो दीखते नहीं और जिनके जीवन में अँधेरा ही अँधेरा है। लेकिन ताजमहल को वे ही खड़ा किए हुए है।

लालजी के ये शब्द मुझे हमेशा याद रहते हैं और में नीव का पत्थर बना रहना चाहता हूँ।

इसलिए हमें भी ज़िन्दगी में दिखावे से बचकर वो कार्य करना चाहिए जो असल में ज़रूरी है।

कोई छोटा बड़ा नहीं | Short Hindi Story with Moral

एक छोटे से कस्बे में शंभू शिल्पकार रहता था। वह पहाड़ों से बड़े-बड़े पत्थर तोड़कर लाता और उसे आकार देकर मूर्तियां बनाता। इस रोजगार में मेहनत बहुत ज्यादा थी , आमदनी कम।

दिन भर धूप पसीने में काम करते हुए शंभू पत्थर तोड़ता। यह काम उसके पूर्वज भी किया करते थे।

शंभू काम करते हुए सोचता है , यह छोटा-मोटा काम करने से क्या फायदा? ठीक से दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती। मैं बड़ा आदमी बन जाऊं तो काम भी ज्यादा नहीं करना होगा और बैठकर आराम से ऐस मौज करूंगा।

एक रोज वह ऐसे नेता को देखता है , जिसके आगे पीछे हमेशा भीड़ रहती है। उसको हाथ जोड़कर प्रणाम करने वाले सैकड़ों लोग खड़ी रहती हैं। शंभू ने नेता बनने की ठान ली , कुछ दिनों में वह नेता बन गया।

नेता बनने के बाद जब वह एक रैली कर रहा था , धूप काफी तीव्र थी। धूप की गर्मी वह सहन नहीं कर पाया और बेहोश होकर वहीं गिर गया।

होश आने पर उसने पाया वह बिस्तर पर लेटा हुआ है।

बिस्तर पर लेटे लेटे वह सोचने लगा कि नेता से बलवान वह सूर्य है जिसकी गर्मी कोई सहन नहीं कर पाता। मुझे अब सूर्य बनना है। कुछ दिनों बाद वह सूर्य भी बन गया।

शंभू अब गर्व से चमकता रहता और भीषण गर्मी उत्पन्न करता। तभी उसने देखा एक मजदूर खेत में आराम से काम कर रहा है। उसने गर्मी और बढ़ाई मगर मजदूर पर कोई फर्क नहीं पड़ा। विचार किया तो उसे मालूम हुआ। ठंडी-ठंडी हवा पृथ्वी पर बह रही है , तब शभु ने विचार किया। हवा बनकर मैं और शक्तिशाली बन जाऊंगा , कुछ दिनों बाद वह हवा बन गया।

हवा बनकर वह इतराता-इठलाता इधर-उधर घूमने लगा।

अचानक उसके सामने विकराल पर्वत आ गया , जिसके पार वह नहीं जा सका। तब उसने सोचा मैं इससे भी बड़ा पर्वत बनकर रहूंगा। कुछ समय बाद वह विशालकाय पर्वत बन गया।

अब उसे अपने आकार और शक्तिशाली होने का घमंड हो गया।

कुछ दिनों बाद उसे छेनी-हथौड़ी की आवाज परेशान करने लगी।

वह काफी परेशान हो गया , उसकी आवाज इतनी कर्कश थी जो उसके शरीर को तोड़े जा रही थी।

आंख खुली तो उसने देखा एक शिल्पकार उसके पर्वत को तोड़ रहा है।

लेकिन अब वह मजदूर नहीं बनना चाहता था। वह काफी परेशान था , नींद खुली तो उसने आईने में पाया – वह जो विशाल पर्वत को भी तोड़ने का साहस रखता है वह तो स्वयं वही है।

जो होता है, अच्छे के लिए होता है | Short Hindi Story with Moral

एक बार शहंशाह अकबर (Akbar) एंव बीरबल (Birbal) शिकार पर गए और वहां पर शिकार करते समय अकबर की अंगुली कट गयी। अकबर को बहुत दर्द हो रहा था। पास में खड़े बीरबल( Birbal ) ने कहा – “कोई बात नहीं शहंशाह, जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है।” अकबर( Akbar ) को बीरबल की इस बात पर क्रोध आ गया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि बीरबल को महल ले जा कर कारागाह में डाल दिया जाये। सैनिकों ने बीरबल को बंधी बना कर कारागाह में डाल दिया एंव अकबर अकेले ही शिकार पर आगे निकल गए।

रास्ते में आदिवासियों ने जाल बिछा कर शहंशाह अकबर को बंधी बना लिया और अकबर की बली देने के लिए अपने मुखिया के पास ले गए।

जैसे ही मुखिया अकबर की बली चढाने के लिए आगे बढे तो किसी ने देखा कि अकबर की तो अंगुली कटी हुई है अर्थात् वह खंडित है इसलिए उसकी बली नहीं दी जा सकती और उन्होंने अकबर को मुक्त कर दिया। अकबर को अपनी गलती का अहसास हुआ एंव वह तुरंत बीरबल के पास पहुँचा। अकबर (Akbar) ने बीरबल को कारागाह से मुक्त किया एंव उसने बीरबल से माफ़ी मांगी कि उससे बहुत बड़ी भूल हो गयी जो उसने बीरबल (Birbal) जैसे ज्ञानी एंव दूरदृष्टि मित्र को बंधी बनाया। बीरबल ने फिर कहा – जो भी होता है अच्छे के लिए होता है। तो अकबर ने पूछा कि मेरे द्वारा तुमको बंधी बनाने में क्या अच्छा हुआ है?

बीरबल ने कहा, शहंशाह अगर आप मुझे बंधी न बनाते तो में आपके साथ शिकार पर चलता और आदिवासी मेरी बली दे देते। इस तरह बीरबल की यह बात सच हुई की जो भी होता है उसका अंतिम परिणाम अच्छा ही होता है।

दोस्त्तों यह कहानी (Moral Story) साबित करती है कि जो होता है, वह अच्छे के लिए ही होता है (Whatever happens, happens for good)। अच्छे का अर्थ उचित एंव न्यायपूर्ण परिणाम से है। दोस्तों अगर आपको ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में न्याय करने के लिए बुलाया जाये जिसने कोई बुरा कार्य किया है तो आप क्या करेंगे? आप जरूर उसे ऐसी सजा देंगे या ऐसा कार्य करने को बोलेंगे जिससे कि उसको अपनी गलती का अहसास हो जाये और ऐसा करना ही सबसे न्यायपूर्ण एंव उचित होगा| दोस्तों अब प्रश्न उठता है कि सजा देने में उस व्यक्ति का क्या अच्छा हुआ जिसने कोई बुरा कार्य किया था? सजा देने में उस व्यक्ति का अच्छा ही हुआ है क्योंकि अगर उस व्यक्ति को इस बात का अहसास न हो कि उसने कुछ गलत किया है तो शायद वह व्यक्ति अपना सारा जीवन ऐसे ही बुरे कार्यो में व्यर्थ गँवा दे और जब उसके बाल सफ़ेद हो एंव दांत गिरने लगे तो इस बात पर पछताए की काश किसी ने उस वक्त सही रास्ता दिखा दिया होता तो यह जीवन (Life) व्यर्थ न जाता|

“शायद ही इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो मुसीबतों, कठिनाइयों, पराजय, मेहनत एंव गलतियों के बिना सफल हुआ हो। इसलिए हो सकता है कि आपकी मुसीबतें, कठिनाईयां, पराजय एंव गलतियाँ इस बात का सूचक है की आप जल्द ही सफल (Successful) होने वाले है।”

दोस्तों हमारे साथ भी हमेशा अच्छा ही होता है फर्क सिर्फ इस बात का है कि कुछ लोग इस बात पर विश्वास (Believe) करते है एंव हिम्मत नहीं हारते और यहीं दृढ़ निश्चय एंव विश्वास उनको सफलता (success) तक ले जाता है। वहीँ दूसरी ओर कुछ लोग ऐसी बातों पर विश्वास (Believe) नहीं करते एंव जल्द ही निराश (Disappointed) हो जाते है और यही निराशा उनको सफल (successful) होने से रोकती है।

जीवन का सत्य | Short Hindi Story with Moral

एक बार कुछ पुराने मित्र कॉलेज छोड़ने के कई वर्षों बाद मिले और उन्होंने अपने कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर से मिलने का सोचा। वे अपने प्रोफ़ेसर के घर गए। प्रोफ़ेसर ने उनका स्वागत किया एंव वे सभी बातें करने लगे। प्रोफ़ेसर के सभी छात्र अपने अपने करियर में सफल थे और आर्थिक रूप से सक्षम थे। प्रोफ़ेसर ने सभी से उनकी जिंदगी एंव करियर के बारे में पूछा।

सभी ने यही कहाँ कि वे अपने अपने क्षेत्रों में अच्छा कर रहे है। लेकिन सभी ने कहाँ कि भले ही वे आज अपने अपने करियर में सफल है लेकिन उनके स्कूल एंव कॉलेज के समय की जिंदगी आज की Life से कहीं ज्यादा अच्छी थी। उस समय उनकी जिंदगी में इतना ज्यादा तनाव एंव काम कर प्रेशर नहीं था।

प्रोफ़ेसर ने सभी के लिए चाय बनाई। प्रोफ़ेसर ने कहा कि मैं चाय तो ले आया लेकिन सभी अपने अपने कप अन्दर रसोई से ले आएं। रसोई में कई तरह के अलग अलग कप रखे हुए थे। सभी रसोई में गए और रसोई में पड़े बहुत सारे कपों में से अपने लिए अच्छे से अच्छा कप लेकर आ गए।

जब सभी ने चाय पी ली तो प्रोफ़ेसर ने कहा – मैं आप लोगों को आपके जीवन की एक सच्चाई बताता हूँ। आप सभी रसोई में से सबसे महंगे और शानदार दिखने वाले कप उठाकर ले आये है। आप में से कोई भी अन्दर पड़े साधारण एंव सस्ते कप नहीं लेकर आया है।

प्रोफ़ेसर ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा – दोस्तों कप का उद्देश्य चाय को उठाना होता है और ज्यादा महंगे एंव अच्छे दिखने वाले कप, चाय को अधिक स्वादिष्ट नहीं बनाते। हमें अच्छी चाय की आवश्यकता होती है, महंगे कप की नहीं।

हमारी Life चाय की तरह होती है और नौकरी, पैसा एंव समाज में इज्जत इन कप की तरह होती है। नौकरी एंव पैसा जीवन जीने के लिए आवश्यक है लेकिन यह जीवन नहीं है।

कभी कभी हम लोग अधिक महंगे एंव अच्छे दिखने वाले कप के चक्कर में “चाय” को भूल जाते है। जिस तरह चाय का स्वादिष्ट होना कप पर नहीं बल्कि चाय की गुणवता एंव चाय बनाने के तरीके पर निर्भर करता है उसी तरह हमारे जीवन में खुशियाँ पैसों पर नहीं बल्कि हमारे संस्कारों एंव हमारे जीवन जीने के तरीके पर निर्भर करती है।

संघर्ष ही जीवन है | Short Hindi Story with Moral

जीवन में सफलता उसी को मिलती है जिसने मुसीबतों का सामना किया हैं। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में कहा है –

“जीवन एक संघर्ष है एंव इसका सामना प्रत्येक व्यक्ति को करना होता हैं।”

मुसीबतों से भागना, नयी मुसीबतों को निमंत्रण देने के समान है। जीवन में समय-समय पर चुनौतियों एंव मुसीबतों का सामना करना पड़ता है एंव यही जीवन का सत्य है।

अंग्रेजी में एक कहावत है –

“एक शांत समुन्द्र में नाविक कभी भी कुशल नहीं बन पाता” – “A smooth sea never made a skillful mariner”।

कोई भी एक ऐसा सफल व्यक्ति नहीं मिलेगा जिसने सफलता से पहले असफलता एंव मुसीबतों का सामना न किया हो।

कभी हार मत मानो

बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है।

“अधिकतर लोग ठीक उसी समय हार मान लेते है, जब सफलता उन्हें मिलने वाली होती है। विजय रेखा बस एक कदम दूर होती है, तभी वे कोशिश करना बंद कर देते है। वे खेल के मैदान से अंतिम मिनट में हट जाते है, जबकि उस समय जीत का निशान उनसे केवल एक फुट के फासले पर होता है|” — एच रोस पेरोट

सबसे ज्यादा खुश | Short Hindi Story with Moral

एक कौआ था जो अपनी जिंदगी से बहुत खुश और संतुष्ट था। एक बार वह एक तालाब पर पानी पीने रुका। वहां पर उसने सफ़ेद रंग के पक्षी हंस को देखा। उसने सोचा मैं बहुत काला हूँ और हंस इतना सुन्दर इसलिए शायद हंस इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा।

कौआ हंस के पास गया और बोला तुम दुनिया के सबसे खुश प्राणी हो।

हंस बोला – मैं भी यही सोचा करता था कि मैं दुनिया का सबसे खुश पक्षी हूँ जब तक कि मैंने तोते को न देखा था। तोते को देखने के बाद मुझे लगता है कि तोता ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी है क्योंकि तोते के दो खुबसूरत रंग होते है इसलिए वही दुनिया का सबसे खुश पक्षी होना चाहिए।

कौआ तोते के पास गया और बोला – तुम ही इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो।

तोता ने कहा – मैं पहले बहुत खुश था और सोचा करता था कि मैं ही दुनिया का सबसे खुबसूरत पक्षी हूँ। लेकिन जब से मैंने मोर को देखा है, मुझे लगता है कि वो ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी है क्योंकि उसके कई तरह के रंग है और वह मुझसे भी खुबसूरत है।

कौआ चिड़ियाघर में मोर के पास गया और देखा कि सैकड़ों लोग मोर को देखने के लिए आए है। कौआ मोर के पास गया और बोला – तुम दुनिया के सबसे सुन्दर पक्षी हो और हजारों लोग तुम्हे देखने के लिए आते है इसलिए तुम ही दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो।

मोर ने कहा – मैं हमेशा सोचता था कि मैं दुनिया का सबसे खुबसूरत और खुश पक्षी हूँ लेकिन मेरी खूबसूरती के कारण मुझे यहाँ पिंजरे में कैद कर लिया गया है। मैं खुश नहीं हूँ और मैं अब यह चाहता हूँ कि काश मैं भी कौआ होता तो मैं आज आसमान में आजाद उड़ता। चिड़ियाघर में आने के बाद मुझे यही लगता है कि कौआ ही सबसे खुश पक्षी होता है।

असम्भव कुछ भी नहीं | Short Hindi Story with Moral

Rajinder Singh Rahelu ! शायद नाम न सुना हो, क्योंकि यह क्रिकेटर या फ़िल्मी हीरो नहीं है। बहुत ही गरीब परिवार में जन्मे राजिंदर सिंह राहेलू कभी अपने पैरों पर चल नहीं सके क्योंकि उन्हें बचपन में महज 8 महीने की उम्र में पोलियो हो गया था। लेकिन क्या आप सोच सकते है – एक व्यक्ति जिसके पैर इतने कमजोर है कि वह जिंदगी में अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सका, वह 185 किलोग्राम वजन उठा सकता है ?

राजेंद्र सिंह राहेलू यह कारनामा दिखा चुके है। उन्होंने 2014 कामनवेल्थ खेलों (Commonwealth Games) में हैवीवेट पावर लिफ्टिंग (Power Lifting) में 185 KG. वजन उठाकर रजत पदक जीत चुके है। Rajinder Singh Rahelu उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो शारीरिक असक्षमता से पीड़ित है।

22 जुलाई, 1973 को जन्मे राजिंदर को 8 महीने की उम्र में ही पोलियो हो गया था। उनका बचपन गरीबी और विकलांगता से लड़ने में बीता, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। सन् 1996 में उन्होंने अपने मित्र से प्रेरणा लेकर वेट लिफ्टिंग में करियर बनाने की सोची। वे प्रैक्टिस करने के लिए ट्राई-साईकिल पर जाते थे और जहाँ ट्राई-साइकिल नहीं ले जा सकते थे वहां वे अपने हाथों से चलकर जाते थे।

कई मुसीबतें आई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और बहुत जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली। Rajinder अपनी मेहनत से पॉवर लिफ्टिंग में कामयाब होते गए। सन् 2004 में उन्होंने 56 किलोग्राम वर्ग में एथेंस पैराओलिंपिक खेलों में कांस्य पदक जीता।

उन्होंने 2008 और 2012 पैरओलिंपिक खेलों में पॉवर लिफ्टिंग खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2012 पैराओलिंपिक खेलों में वे 175 किलोग्राम वजन उठाने में अपने तीनों प्रयासों में चूक गए लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने 2014 कॉमनवेल्थ खेलों में शानदार प्रदर्शन करके 185 किलोग्राम वजन उठाकर में रजत पदक अपने नाम किया और आज वे युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है। आज वे एक कोच के रूप में युवाओं एंव असक्षम बच्चों को ट्रेनिंग देते है।

वे एक सच्चे हीरो है। उनके जैसे लोग हमारे लिए हर रोज एक नई आशा की किरण लेकर आते है जो यह साबित करती है कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। Rajinder Singh Rahelu जैसे लोगों ने यह साबित किया है कि “असंभव कुछ भी नहीं – Nothing is Impossible”

खुद को बदलिए | Short Hindi Story with Moral

एक नगर में एक राजा रहता था। राजा जब भी महल से बाहर जाता, हमेशा अपने घोड़े पर ही जाता था। एक बार वह अपने नगर को देखने एंव जनता की समस्याओं को सुनने के लिए पैदल ही भ्रमण पर निकला। उस समय जूते नहीं होते थे इसलिए जमींन पर कंकड़ और पत्थरों के कारण राजा के पैर दुखने लगे। राजा ने इस समस्या के हल के लिए अपने मंत्रियों की एक बैठक बुलाई।

ज्यादातर मंत्रियों का यही सुझाव था कि क्यों न पूरे नगर के रास्ते को चमड़े की मोटी परत से ढक दिया जाए। लेकिन इसके लिए बहुत सारे धन एंव अन्य संसाधनों की जरूरत थी।

तभी राजा के पास खड़े एक सिपाही ने सुझाव दिया कि पूरे नगर को चमड़े की परत से ढकने से अच्छा यह है कि क्यों न हम अपने पैरों को ही चमड़े की परत से ढक दें। इससे न केवल हमारे पैर सुरक्षित रहेंगे बल्कि ज्यादा धन भी खर्च नहीं होगा। सिपाही का सुझाव सुनकर राजा प्रसन्न हुआ और उसने सभी के लिए “जूते” बनवाने का आदेश दिया।

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